देव-सुनीता की प्रेमकहानी

                           देव-सुनीता की प्रेमकहानी 






                 जीवन में  युवावस्था  एक महत्त्व पूर्ण समय होता है  जिसमे बहोत से अनुभव होते है   जिसमे से  प्रेम एक सबसे अलग अनुभव होता है जो हम महसूस करते है  प्रेम के बारे में  सबकी सोच अलग होती  है   आज में आपको  एक प्रेम कहानी  बताउगा जिस से  आपको पता लगेगा की सच्चा प्यार होता  और  जिसमे कोई स्वार्थ नहीं होता है  यह कहानी देव-सुनीता की है जिनके जीवन में कितनी परेशानी आती है  और उनकी प्रेम कहानी पूरी होती के ये हम देखेंगे
                         यह कहानी गुजरात के छोटे शहर की है  जहा  देव  एक धनवान परिवार का लडका  है  उसके सिर्फ पिता ही है उसकी  मा  जब वो छोटा तब कैंसर कारण मर गयी थी   और वो  अपने माता-पिता का अकेला लड़का था   दूसरी  तरफ सुनीता एक मध्यम वर्ग की लडकी है  वो अपने  माता-पिता  की  एकलौती संतान है   ये  दोनों  बारवी कक्षा में साथ पढ़ते है  सुनीता अपने क्लास में सबसे होशियार स्टूडेंट है  और  सबसे सुंदर भी है  दूसरी तरफ देव बहुत शांत  और कम बोलने वाला लड़का है  ये दोनों तीन साल  से साथ  पढ़ते  है  जबसे  देव ने  सुनीता को देखा है  तब से  उससे  प्यार करता  है  पर  कभी सुनीता बात भी नहीं की है  उसने  अपना इमोशन को  मन ही रखा है
                    सुनीता जीवन एक समस्या आती  है  उसकी मा  हार्ट अटेक  के कारण  मर जाती  है  उससे  सुनीता उदास हो जाती है उसका मन कही भी नहीं  लगता है  पढ़ाई  में  ध्यान  नहीं देती है  उसके टीचर  उसे समजाते की वोह यह हाल में रहेगी तो फेल हो जायेगी  देव उसकी  हालत देख कर उसे बहुत तकलीफ होती  है
वो सोचता है की सुनीता को इस हालत से निकालना होगा  वो एक रास्ता निकालता है  एक कागज  पर कुछ लिखता  है   उसका बाद  सुनीता हर रविवार को  शिव के मंदिर जाती  वहा उसके आने से पहले  वहा एक भिखारी को वो कागज दे  देता  और थोडे पैसे भी देता  कहेता है की " यहाँ  जब  हर रविवार को जो लड़की आती है    उसे  यह  देना  उसका नाम सुनीता  है  और मेरे बारे कुछ नहीं बताना "  |  उसके बाद वो मंदिर के पास  में  पेड़ के पीछे छिप जाता है  और उसके बाद  सुनीता  मंदिर  में आती है  भिखारी  उसे  देव ने दिया हुआ कागज़  देता
है  सुनीता कागज पढ़ती है  उसमे लिखाता की  " सुनीता तुम क्या कर रही हो तुम अपनी मा की मोत से उदास हो गयी हो पर तुम समजो की  तुम्हारी यह हालत देखकर  तुम्हारी मा जहा होगी वहा से तुम्हे देखती होगी तो उनको कितनी तकलीफ होती होगी तुम्हे उनके लिए खुश और कामियाब होना होगा "  कागज  पढ़ने बाद  सुनीता  ने  भिखारी से पूछा  की  " यह कागज़ किसने दिया "  तो  भिखारी जवाब दिया की " बेटी  जिसने  यह कागज़ दिया उसने अपने बारे में बताने से मना किया है " फिर वहा  सुनीता चली जाती है  उसके बाद  देव भी वहा से चला जाता है
                उसके बाद सुनीता पहले की जेसी हो जाती है  पढ़ाई में भी ध्यान देने लगती  उसके माता-पिता और टीचर यह  देखकर खुश हो जाते  सबसे ज्यादा देव को अच्छा  लगता  उसके मन को शांति मिलती है  उसके बाद बारवी बोर्ड की  परीक्षा खत्म  हो जाती है  फिर देव-सुनीता अलग हो जाते  देव उसके बाद मुंबई उसके पिता के साथ चला जाता  समय बीतता जाता है और सात  साल  चले  जाते  है  देव अब  बिजनसमेन बन  गया  है उसकी खुद की कंपनी है  दुसरी तरफ सुनीता एक कंपनी  नौकरी कर रही  है दोनों  मुंबई  शहेर है  सुनीता अपने कंपनी के दोस्तों के साथ शिमला गुमने  जाते  है  दूसरी तरफ देव काम से ब्रेक लेकर शिमला जाता है  वहा एक ही  होटल  सुनीता और देव जाते  है  दोनों  एक दूसरे टकरा जाते है  कुदरत भी शायद  उनको मिलाना चाहती थी  दोनों एक दूसरे को  "सोरी"  कहते है वहा से अपने-अपने रूम में चले जाते है  अगले  दिन  दोनों  शिमला  की मोल में जाते है वहा फिर से टकरा जाते है  इस बार देव ने बोला की  "हम बार-बार  इस टकराते तो हमें दोस्ती कर नी चाहिये  " तो सुनीता बोलती है की  " क्या मेने आपको पहले कही देखा है "  तो देव उसका उतर देता है की " हम साथ में स्कूल में पढ़ते थे "  फिर देव  उसे कॉफी के लिए पूछता है  तो सुनीता  ठीक है  कहती है  दोनों एक रेस्टोरेन्ट में  जाते है  वहा दोनों कोफ़ी  पीते  बाते करते है  सुनीता कहती है की  " हम साथ में तीन साल स्कूल पढ़े लेकिन यहा बात हो रही है "   उसके बाद देव कहता है की  " आप क्लास सबसे सुंदर और होशियार स्टूडेंट थी  और में  बहोत कम बोलेने वाला था  "  फिर सुनीता कहती है की " आप अभी क्या कर रहे है " तो  देव उसका उतर देता है  " फ़िलहाल तो  आपसे कोफ़ी पीते बाते कर रहा हु "   सुनीता  यह सुन कर हस देती  है   फिर देव  देव बोलता है  " में एक बिजनेस मेन  हु  और आप क्या करती हो " उसके बाद सुनीता उतर देती है की  " में एक कपनी में नोकरी करती हु  " दोनों बहुत सारी बाते करते   है  उस के  बाद दोने अपना फ़ोन  नंबर एक दूसरे को  दिया  उस  के  बाद दोनों वहा चले जाते है
              दोनों शिमला में सात दिन रुकते है  इतने समय में बहुत कुछ बदल चूका है  दोनों  एक दूसरे को बहुत अच्छी तरह से जान चुके है पहले  देव ही सुनीता से प्यार करता था पर  अब सुनीता भी देव को मन ही मन प्यार करने  लगी थी  देव की भी लगने लगा की सुनीता उसे प्यार करने लगी है  दोनों एक साथ विमान साथ मुंबई लोटते है  वहा से दोनों अपने घर चले जाते  है  उसके बाद क्या होने वाला  दोनों  नहीं पता  था  देव  के बिजनेस में नुकसान होता  और  उसकी कंपनी बंध हो जाती है  उसके बाद कार दुर्घटना में  उसके  पिताजी की मोत हो जाती  है   और देव  कार  के काच लगने  वो अंध हो  जाता  है  दूसरी तरफ सुनीता को लगता है  उसे अपनी  मन की बात देव  को  बतानी चाहिए  की वो देव  को प्यार करती है  वो  देव  को बताये  हुये  फ़ोन नंबर लगाती है  देव  फ़ोन  उठाता  है  सुनीता कहती की में तुम से एक बात बतानी है  तो देव कहता है  "बोलो" फिर सुनीता कहती है की " में तुमसे प्यार करती हु  और तुमसे मिलने चाहती हु  " तो  देव कहता है की "अभी में  व्यस्त  हु  उसके बाद मिलेंगे "  उसके बाद सुनीता कहती है की " ठीक है"  फिर देव फ़ोन काट देता है  उसके बाद  कई बार कई दिन सुनीता फ़ोन लगाती है पर देव फ़ोन नहीं उठता  फिर  सुनीता समजती है देव उसे प्यार नहीं करता इस लिये फोन नहीं  उठता  होगा  दूसरी  तरफ देव की बड़ी बुरी हालत  हो  जाती  है  वो  अंदर से टूट जाता   जिससे वो  बचपन से प्यार करता है  वो  आज उसे प्यार करती है पर  वो क्या  करे  वो  उसे  यह  हालत दिखाना नहीं चाहता है  और  वो  केसे बताये की वो अंधा हो गया  उसके  पास कुछ नहीं रहा है  देव  तय  कर लिया था की अब वो सुनिता को कभी  नहीं  मिलेगा 
         देव को जहा सुनीता बचपन में जो हर रविवार को शिव मंदिर जाती थी वहा जाने की इच्छा होती है  तो  वो वहा जाता है  मंदिर जा के  वो अपने बचपन की यादे ताजा हो जाती है की  बचपन में जब सुनीता मंदिर आती थी तो वोह मंदिर के पीछे छुप के उसे देखता था  अचानक वहा सुनीता भी आती है  वो देव को देखती है उसे देख कर समज जाती क्या हुआ है   वो देव के पास जाती है और  बोलती है की " देव तुमने मुझे अपनी यह हालत के बारे में क्यू  नहीं बताया "  तो  देव उसका उतर देता है की  " में कैसे तुम्हे  में बताऊ की  में  अंधा  हो चूका  जो  देव को  तुम जानती थी वोह देव अभी नहीं  रहा  " फिर सुनीता बोली  " तुम  मुज पर इतना विश्वास नहीं था  में तुम्हे सच्चा प्यार करती हु "  उसके  बाद  सुनीता ने कहा   जिसने ने बचपन में  जब  में मा गुजर जाने पर में उदास हो गयी थी  तब मुझे उस उदासी से निकला था उसे कैसे भुल सकती  हु  "  तब  देव  बोला   " सुनीता  तुम्हे  किसने बताया "   तो  सुनीता उसका उतर देती है  की   " मेरी   दोस्त  ने कहा  था   उसने  तुम्हे  कागज  देते  देख  लिया था  "  पर  तब  बारवी की बोर्ड   ख़त्म हो गयी थी पर तब तक तुम वहा से चले गये थे "  फिर दोनों गले  लग जाते  और दोनों  की आँख से अश्रु  आ जाते है  इस तरहा यह प्रेम कहानी  का सुखद अंत होता है  और सच्चे प्यार जीत  होती है
           
           

                       


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